Friday, February 22, 2013

धमाके की सूचना मिल भी गई तो क्या उखाड़ लिये...?

हैदराबाद का दिलसुखनगर...। 21 फरवरी...दिन गुरुवार...शाम के सात बजे थे, लोग अपनी-अपनी मंजिल की तरफ आ-जा रहे थे। कोई दोस्त के साथ, कोई अकेला, कोई पत्नी या प्रेमिका के साथ, कोई मां-बाप के साथ...। किसी को किसी प्रकार की अनहोनी की आशंका नहीं थी। लेकिन इसी सोच के बीच खून की होली खेलने का प्लान रचा जा चुका था।

लगभग 7 बजकर 05 मिनट पर दिलसुखनगर बस स्टैंड के पास जोरदार धमाका होता है। कोई कुछ समझ पाता, इतने में एक दूसरे ब्लास्ट ने चीत्कार की आग में पेट्रोल डालने का काम कर दिया। चारों तरफ अफरा-तफरी। सड़कों पर खून ही खून, चीख-पुकार और असहनीय दर्द की हुंकार ने पूरे देश को हिला दिया, सिवाय उन नापाक लोगों के जिन्होंने यह किया। पलक झपकते यह खबर जंगल में आग की तरह फैली, आनन-फानन में पुलिस ने पूरे इलाके को सील कर दिया, फायर ब्रिगेड की गाड़ी, मौके पर बम स्क्वायड दस्ते की दस्तक...कुल मिलाकर पूरा प्रशासन घटनास्थल पर हाजिर। उधर, हैदराबाद में हुए धमाके की गूंज ने दिल्ली के भी कान खड़े कर दिये।


पीएम, गृहमंत्री से लेकर विपक्षीगण धमाके की निंदा करने में लग गए। सभी का एक जैसा बयान, ऐसा करने वालों को बक्शा नहीं जाएगा...मुंह तोड़ जवाब देंगे...हमारे हौसले को डिगा नहीं सकते...इस हमले की हम घोर निंदा करते हैं...मरने और घायलों के परिवार को हमारी तरफ से सांत्वना। आज भी वही घिसी-पिटी बयानबाजी। मरने वाले मर गए...लेकिन हर बार की तरह इस बार भी इनका सिर्फ मुंह चला और एक दूसरे के ऊपर छींटाकसी। देश जानता है...दो-चार दिन की भागदौड़ के बाद पुलिस कुछएक को गिरफ्तार करेगी, चार्जशीट दायर कर आरोपी रिमांड पर लिए जाएंगे और फिर वही होगा जो हर बार होता आया है...तारीख पे तारीख...तारीख पे तारीख...।


जोश में आकर अगर कोर्ट ने थोड़ी जल्दबाजी दिखा भी दी तो साल दर साल सजायाफ्ता लोगों की फाइल साहबों के दफ्तर में चक्कर काटती रहेगी। आखिरकार फाइल असली माई-बाप के पास पहुंच भी जाएगी तो क्या होगा...। माई-बाप जो ठहरे...। आरोपियों पर तो दया नहीं आएगी लेकिन इनके परिवार का सूखा हुआ चेहरा देख पिघलने पर ये मजबूर हो जाते हैं। इस बीच दया याचिका का पिटारा ''यहां'' पटका जाएगा, जिसके बाद एक बार फिर पीड़ित परिवार के उस घाव पर नमक-मिर्च लगाकर तड़पने के लिए छोड़ दिया जाएगा।

घूम-फिरकर देश को सीख क्या मिली...हमें तो कुछ नहीं, आतंकियों का हौसला ऊपर से बुलंद हो गया। दिलसुखनगर ब्लास्ट के बाद गृहमंत्री ने कहा, ''हमें तो दो दिन पहले से ही सूचना मिल गई थी...हमने राज्यों को बता दिया था...। लेकिन यह धमाका कहां होने वाला है, जगह का नाम सामने नहीं आया।'' सही कहा गृहमंत्री जी, फिल्मों में विलेन की तरह आतंकियों को भी फोन करके आपको जगह का नाम बता देना चाहिए था।


आज देश की एक ही आवाज निकल रही है कि जब दो दिन पहले आपको सूचना थी तो क्या उखाड़ लिये...। जिसे उखाड़ना था, वो तो उखाड़कर चलता बना... अब आप राज्यों को अलर्ट की सूचना देने का राग अलापते रहो...। इतना कुछ देखकर तो यही लगता है कि आतंकी कायर नहीं, क्योंकि वो बताकर धमाका (गृहमंत्री को पहले जानकारी थी...जैसा की बताया गया) करते हैं। कायर आप बन जाते हो क्योंकि आप और आपकी सुरक्षा व्यवस्था उस गुब्बारे की तरह हो गई है, जिसमें एक सूई चुभोई और फिस्सससस!!!

Sunday, December 23, 2012

प्रधानमंत्री जी, आशा करता हूं आप आगे भी मौन धर्म निभाएंगे...

आदरणीय प्रधानमंत्री जी,

दिल्ली में बैठकर आप पूरे देश पर नजर रखते हैं। समझ सकता हूं, यह काम बहुत कठिन है। हर जगह आप पहुंच तो नहीं सकते न...लेकिन सरेराह महिलाओं के साथ दिल्ली पुलिस ने जो दरिदंगी की, उसे भी आप न देख सके। लड़कियों, महिलाओं को आपकी पुलिस ने दौड़ा-दौड़कर पीटा, कड़कती ठंड़ में पानी की बौछारें छोड़ी, आंसू गैस के गोले दागे। पूरा देश इस अत्याचार को देखकर रो पड़ा...। लेकिन यह आंसू आप न देख सके। अफसोस। बहुत दुखः हुआ। निराशा भी हुई। महिलाओं ने सिर्फ एक गलती की...हक जो मांग लिया।

पूरा देश एक दरिंदगी पर उठ खड़ा हुआ लेकिन आपने अपना आसन नहीं छोड़ा। सही भी है..। ऐसी दरिदंगी तो आए दिन होती ही रहती है। कहां तक आप नजर रखोगे। किस-किस को आप जवाब दोगे। आपके पास एक काम थोड़ी ही है...। लेकिन प्रधानमंत्री महोदय, एक नागरिक होने के नाते मैं आपको बता दूं कि यह दरिदंगी कोई आम नहीं थी। एक लड़की को इंसान रूपी हवसी कुत्तों ने चलती बस में नोचा। कई घंटे तक उसकी आबरू को तार-तार किया गया। इतना ही नहीं उसके साथ जो कुछ हुआ उसे देख और सुनकर पूरे देश के रोंगटे खड़े हो गए। वो खौफनाक मंजर को याद कर पीड़िता कांप उठती है। अभी भी वह लड़की अस्पताल में दर्द से कराह रही है, जबकि पूरा देश आपके मौन रूप को देखकर तड़प रहा है।

जिस देश में महिलाओं को सबसे ऊंचा स्थान आपने दिया है, आज वही औरत जमीन में पड़ी दर्द से छटपटा रही है। सिर्फ झूठे आश्वासन से उसके घाव को भरा जा रहा है। आज स्थिति यह हो गई है कि घर से निकलने वाली हर लड़की, हर महिला डरती है। प्रधानमंत्री जी, यह डर आपने और आपकी सरकार ने ही पैदा किए हैं। क्योंकि दिल्ली में जिस तरीके से हक की एक आवाज को लाठी की चोट पर आपने दबवाया, उसको देख महिलाओं को आप और आपके कानून पर से भरोसा उठ चुका है।

एफडीआई जैसे मुद्दे पर आपकी सरकार ने जो एकजुटता दिखाई वह काबिलेतारीफ थी। लेकिन एक लड़की की चीख को आपकी सरकार ने अनसुना कर दिया। इन्हीं महिलाओं ने जब आपसे अपना हक मांगा तो वहां भी आपने मुंह फेर लिया, और...। पूरे देश ने आपकी कारश्तानी देखी।

हक के लिए निकलने वाली हर आवाज को कुचल डालो...। यही आपकी सरकार की तरफ से किया जा रहा है। वोट मांगने के लिए राहुल गांधी, सोनिया गांधी गांव-शहर का दौरा करते हैं और एक वादा करके लौटते हैं लेकिन आज कोई सामने न आ सका। शायद किसी के पास कोई जवाब न रहा होगा। मेरे पास भी आपसे कहने को अब ज्यादा कुछ नहीं है, और आखिर में यही आशा करता हूं कि आप अपने मौन व्रत को कभी टूटने नहीं देंगे। धन्यवाद।

Friday, December 21, 2012

जीत के हर जश्न में जनता की जय हो...

तीसरी बार जीत की हैट्रिक। क्रिकेट के शब्दों में कहें तो ट्रिपल सेंचुरी। जी हां। हम बात कर रहे हैं दबंग - 3 मतलब नरेन्द्र मोदी की। पांच साल की पिच पर नरेन्द्र मोदी ने निर्भीकता और निडरता के साथ चौके-छक्के लगाकर एक बार फिर से इतिहास रच दिया। विरोधियों ने कितने ही वार किए लेकिन मोदी ने जिस धैर्य के साथ काम लिया, आज वह पूरी दुनिया के सामने एक मिसाल बन गई है। 115 सीट पर मोदी की जय...। हांलाकि पिछली बार से एक सीट कम लेकिन इतनी बड़ी संख्या में एक सीट की कोई अहमियत नहीं।

तीसरी बार मुख्यमंत्री की गद्दी पर काबिज होने के बाद जब मोदी पहली बार गुजरात की जनता के सामने आए तो उन्हें भावुक अंदाज में देखा गया। यह जीत मोदी की नहीं बल्कि 6 करोड़ गुजरातियों की है...यह वाक्य जब मोदी के मुख से निकला तो तालियों की गड़गड़ाहट सुनने लायक थी। लगभग 30 मिनट के भाषण में मोदी ने 100 से ज्यादा बार गुजरात की जनता का कोटि-कोटि अभिनंदन किया। ऐसा पहली बार किसी मुख्यमंत्री की सभा में देखा गया जिसने अपनी जीत का पूरा श्रेय जनता को दिया।

विरोधियों ने मोदी के ऊपर पिछले पांच साल में जमकर कीचड़ उछाले लेकिन गुजरात की जनता ने उसको धो डाला। वोट का इतना पर्सेंटेज देखकर एक बार तो मोदी भी हैरान-परेशान हो गए थे। यहां तक उन्होंने मीटिंग तक बुला ली थी कि इतने वोट पड़ने के मायने क्या हो सकते हैं, कहीं कुछ...। लेकिन मोदी की शंका को गुजरात की जनता ने दरकिनार कर दिया।

जितनी धमाकेदार वोटिंग हुई थी, उतने ही धमाकेदार अंदाज में मोदी ने विजय पताका फहराई। जनता का यह उत्साह देखकर मोदी से रहा नहीं गया। उन्होंने अपने भाषण के हर शब्द में जनता रूपी भगवान का गुणगान किया। मोदी को शायद यकीन नहीं था कि उन्हें इतना जबरदस्त समर्थन मिलेगा। ऐसा माना जा रहा था कि मोदी को मुस्लिम वोट से महरूम होना पड़ेगा लेकिन गुजरात की जनता ने इसे झुठला दिया। पूरी दुनिया को गुजरात ने यह दिखा कि सिर्फ विकास ही वोटिंग का आधार होना चाहिए। ज्यादती दुश्मनी, जाति - पाति के आधार पर वोट से फायदा तो कम लेकिन भविष्य अंधकारमय जरूर हो जाएगा...यह बात गुजरात की जनता ने दिखा दिया। गुजरात के 6 करोड़ लोगों ने 121 करोड़ देशवाशियों को एक नया रास्ता दिखाया है, एक संदेश दिया है। मोदी ने भी गुजरात की जनता को पूरे देश के सामने एक आईडियल के रूप में प्रस्तुत किया।

Thursday, May 17, 2012

गांव का सफर और ट्रेन में बीती एक डरावनी रात



भोपाल से प्रतापगढ़ तक स्पेशल ट्रेन का सफर मेरे लिए मुसीबत बन गई। शुरुआत लेटलतीफ से हुई। ट्रेन का टाइम सुबह 8.30 बजे, लेकिन रास्ते भर खाते-पीते वह 11.45 बजे आई। एस-2 में ऊपर की सीट। सामान पटककर ऊपर जा बैठा, बिना कुछ इधर-उधर किए चद्दर निकाल मुंह पर डाला और खर्राटे भरने लगा। चूंकि रातभर ऑफिस में काम किया था तो भयंकर नींद आनी स्वाभाविक थी। कुंभकर्ण की तरह ऐसे सोया कि पता ही नहीं चला शाम के 6 कब बज गए। आंख मींजते उठा, नीचे वालों से गाड़ी की स्थिति पूछी, तो वो घूरने लगे। थोड़ा रुकने के बाद गुर्राकर एक जनाब ने दयादृष्टि दिखाई और कहा-भाई यह स्पेशल पूरे पांच घंटे लेट है।

हर मालगाड़ी के क्रॉस होने के बाद इसको हरी झंड़ी मिल रही है। सभी गाली दे रहे थे, साला नाम है स्पेशल लेकिन है पैसेंजर से भी बदतर। पैदल चल दूंगा लेकिन अब कभी इसके चक्कर में नहीं पड़ूंगा..तमाम तरह की ऊट-पटांग बातें निकल रही थीं। मैं भी ऊपर से नीचे आ गया। इधर-उधर देखा ही था कि मन में एक अजीब सी डर पैदा हो गई। गिने-चुने लोग वहां पर दिख रहे थे। पूरी बोगी का चक्कर लगाने के बाद जब गिनती की तो होश पाख्ता हो गए।

बोगी नंबर- 2 में सवारी सिर्फ 50। यहीं से भयानक डर की शुरुआत हो चुकी थी। लगभग सात बजे ट्रेन उरई स्टेशन (कानपुर के पहले) पहुंची। मटकी का रसगुल्ला यहां बड़ा फेमस है। पांच रु. पर पीस। भूख लगी थी, 15 पीस वाला मटका ही खरीद लिया और धीरे-धीरे करके सब निपटा दिया, क्योंकि भूख का भंवर काफी गहरा हो गया था।

यहां से कानपुर पहुंचने में लगभग 3 घंटे लगना था, जैसा कि बताया गया। लेकिन जब एक से दूसरे स्टेशन के बीच कोई गाड़ी दस बार स्टे करेगी, तो खाक समय से कोई पहुंचेगा! लगभग 12 बजे गाड़ी कानपुर पहुंची। अब मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी। पूरी बोगी वीरान। अजीब सा सन्नाटा। घूमकर बोगी का मुआयना किया तो सिर्फ 5 लोग दिखे। गुदगुदाती ठंड़ में नींद आ रही थी, डर भी लग रहा था कि पता नहीं, कब क्या होगा। भोपाल से चलते टाइम कुछ भाई लोगों ने बताया था कि कानपुर से इलाहाबाद के बीच जहरखुराने वाले ज्यादा एक्टिव होते हैं। लेकिन मैंने बहादुरी के पींगे हांकते हुए यह बात यूं ही में टाल दी थी। पांच लोग वो भी अनजान, उनके पास जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। कोई पुलिसवाला भी नहीं था। ट्रेन कहीं भी खड़ी हो जा रही थी। कभी आउटर तो, कभी सूनसान खेत के पास। मौके की नजाकत को देख नीचे की बजाय ऊपर वाली सीट फिर से थाम ली। सामान भी ऊपर शिफ्ट कर दिया।

गेट के साथ-2 खिड़कियों का भी शटर डाउन कर दिया। कानपुर से थोड़ी दूर जाने के बाद हालत और खराब हो गई। एक मालगाड़ी को क्रास कराने के चक्कर में स्पेशल को ब्रेक लग गया। गाड़ी रुकते ही, दूसरे गेट से दो साधु महाराज का आगमन हुआ। इनका पहनावा काफी डरावना था। वो जहरखुरानी वाली बात याद आ गई लेकिन अब चुपचाप दुबके रहने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। रात के एक बजे, जबरदस्त ठंड़ लेकिन इनका बदन पूरी तरह से खाली। एक हाथ में बड़ा त्रिशूल, दूसरे में वजनी बोरी। लंबे बाल और दाढ़ी। चेहरा खूंखार। डरना लाजमी था। इनके दहशत भरे चेहरे को देख, अपने चेहरे पर चद्दर डाल ली और चद्दर का एक कोना उठाकर इनकी गतिविधियों को देखता रहा।

ये कभी तंबाकू ठोंकते, कभी गेट के पास जाते। अब गला सूख रहा था, बोतल का पानी भी खत्म हो चुका था। कुछ भी, कभी भी हो सकता था लेकिन थोड़ी देर बाद सबकुछ सामान्य हो गया। क्योंकि ये भाई लोग दिखने में दबंग जरूर थे पर ठंड़ को बर्दाश्त न कर सके। अब खर्राटे की आवाज सुनाई देने लगी, इनकी गर्जना के आगे अब मेरी नींद फुर्र हो चुकी थी। और आखिरकार डर की गाड़ी लगभग अल सुबह 3.30 बजे जैसे-तैसे इलाहाबाद पहुंच ही गई। अब चेहरे पर प्रसन्नता का भाव था, सारा गिला-शिकवा और डर खत्म हो चुका था लेकिन मुसीबत की ये स्पेशल मेरे लिए यादगार जरूर बन गई।

Saturday, March 10, 2012

''सच का कत्ल'' सीबीआई जांच क्यूं नहीं...

देश में सच बोलने, सच के खिलाफ लड़ने की कीमत बहुत खौफनाक हो सकती है। इसकी एक बानगी मप्र में एक आईपीएस ऑफीसर की मौत ने दिखा दिया है। इस आईपीएस ऑफीसर नरेन्द्र का कसूर सिर्फ इतना था कि वह भूमाफियाओं के रास्ते में आ गया था। होली के रंग को भी दरकिनाकर कर उसने अपनी जिम्मेदारी निभाई। लेकिन उसे मिली मौत। इन माफियाओं को पनाह देने वालों की आंख की किरकिरी भी यह जांबाज बन चुका था।



पनाह देने वाले कोई और नहीं बल्कि सत्ता में काबिज कई बड़े नेता हैं। तभी तो आईपीएस की मौत के बाद इनकी गंदी जुबान से वही निकला जो आम नागरिक उम्मीद नहीं कर सकता था। शर्म तो तब आई जब इस अधिकारी की मौत के जिम्मेदार लोगों को सजा दिलाने के लिए न्यायिक जांच के आदेश दिए गए।



यह आदेश कोई और नहीं प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ने दिए। एक आम आदमी की मौत की जांच अगर सीबीआई कर सकती है तो एक आईपीएस अधिकारी की मौत की जांच सीबीआई से क्यूं नहीं। हमें तो अपने आप पर शर्म आती है, जब इन नेताओं के भाषण को सुनते हैं। आईपीएस की मौत पर कोई भी नेता ढंग से मुंह नहीं खोल सका। अब तो मध्यप्रदेश को माफिया प्रदेश कहा जाए तो कोई गलत नहीं होगा।


यही किसी नेता के साथ हुआ होता तो पूरे देश में हो हल्ला, दंगा फसाद, शुरु हो गया होता। लेकिन एक ईमानदार ऑफीसर की मौत का तमाशा हर किसी ने देखा लेकिन कार्रवाई के नाम पर सब पीछे हट जा रहे हैं। पता नहीं किस भार के नीचे हमारे नेतागण दब गए हैं। मुझे तो लगता है, इसके पीछे इन माफियाओं का ही हाथ है, रुपए-पैसों से इनके मुंह को बंद कर दिया गया है। गुंड़े-बदमाशों के इशारों पर ही नेताओं का हरकदम आगे बढ़ता है। तभी तो सच को इतनी बेरहमी से कुचल दिया जाता है।


क्या होगा हमारे देश, हमारे नेताओं और हम सबका। क्योंकि अब बड़े अधिकारी ही सुरक्षित नहीं हैं तो एक आम नागरिक अपने आपको कैसे सुरक्षित समझेगा।

Monday, November 28, 2011

'डीजे' लाओ तभी होगा बिटिया का 'ब्याह'

आजकल शादी-ब्याह में होने वाला तामझाम बड़े घरों तक ही सीमित नहीं रहा। जयमाल, बफर सिस्टम, ऑरक्रेस्टा, बैंडबाजा, रोड-लाइट, संगीत कार्यक्रम और डीजे की व्यवस्था अब किसी तरह दो वक्त की रोटी जुगाड़ने वाला भी करने लगा है। इतना ही नहीं शादी-ब्याह में मिलने वाला सामाना जैसे-गाड़ी, टीवी, घड़ी, गांव में बांटने के लिए ढेर सारी मिठाई, और अन्य ढेर सारे सामान की लिस्ट भी आम घरों में बनने लगी है।

तेल भराने का पैसा नहीं लेकिन दहेज में गाड़ी, सोने की मोटी जंजीर, खिलाने-पिलाने (शराब) की धांसू व्यवस्था अब हर घर की पहली च्वाइस बन गई है। कुल मिलाकर अब वो कहावत-जिसमें जितना चादर हो उतना ही पैर फैलाना चाहिए, ओल्ड इज बोल्ड हो गया है, अब तो चादर फट जाए लेकिन पैर बाहर निकलने दो परवाह नहीं। फलां की बेटी की शादी में दूल्हा घोड़े पर आया, डीजे भी था, जबरदस्त मजमा लगा। बस इसी कंपटीशन के पीछे आम लोग पड़ गए हैं। ऐसी प्रतियोगिता अभी तक सिर्फ नौकरी में देखी जा रही थी लेकिन अब शादी-ब्याह भी इससे अछूता नहीं रहा।

घर जाकर इस बार दहेज का बड़ा ही रोचक चेहरा देखने को मिला। गांव के बीच कुछ बनबासी (जिन्हें गांव में सबसे निम्न वर्ग का दर्जा प्राप्त है) रहते हैं, जो रोज गढ्ढा खोदो-रोज पानी पियो की तर्ज पर जीते हैं। न कोई बैंक अकाउंट, न पक्का मकान, सर्दी हो या गर्मी इनके बदन पर ठीक से कपड़ा तक नहीं होता। काम न होने पर ये लोग खेत-खेत जाकर चूहा मारते हैं और शाम को उसे पकाकर छप्पर के नीचे रात गुजारते हैं, सबसे बड़ी बात इनका छप्पर साल में कम से कम चार बार बनता-बिगड़ता है।

ग्राम प्रधान ने पक्का मकान बनाने के लिए कई प्रयास भी किए लेकिन ये लोग जगह को लेकर आपस में भी महाभारत खड़ा कर देते हैं। स्कूल में इनके बच्चों का नाम भी दर्ज है लेकिन बच्चों को लेने के लिए खुद गुरुजी को इनके घर अप-डाउन करना पड़ता है। गांव के अन्य बच्चे प्राइमरी स्कूल में पढ़ने जाते हैं लेकिन ये भाई लोग बच्चों को स्कूल इसलिए नहीं भेजते कि बड़ो के साथ रहकर इनके बच्चे बिगड़ जाएंगे। यह तो हो गया इनका रहन-सहन।

अब देखिए ये भाई लोग गांव में होने वाले शादी-ब्याह पर किस तरह से टकटकी लगाये रहते हैं। रामचरन की बेटी की शादी देख ये पगला ही गए। हुआ कुछ यूं कि रामचरन की बेटी की शादी धूमधाम से हुई। लड़का घोड़े पर आया, आतिशबाजी हुई, डीजे की धुन पर थिरकना और जयमाल सिस्टम भी था। सुबह विदाई में लड़के को गिफ्ट में मोबाइल, टीवी, फ्रिज, कूलर, दहेज में टू ह्विलर गाड़ी भी मिला।

अब यह शादी भाई लोगों के मन में बर्फ की तरह जम गई। इन्होंने ठान लिया कि अब हम भी अपनी बेटी की शादी ऐसे ही धूमधाम से करेंगे। बस क्या था पगलू बनबासी ने दूर के एक गांव में अपनी बेटी ऐश्वर्या की शादी तय कर दी। डिमांड दोनों तरफ से हो गया। लड़के वाले ने गाड़ी मांगी तो लड़की वाले ने कहा-रोड लाइट, रथ और डीजे के बिना शादी नहीं होगी।

पगलू ने शादी की खबर अपनी बस्ती में दे दी। जेब में फूटी कौड़ी नहीं लेकिन दहेज में गाड़ी, ऐश्वर्या को मोबाइल देने की बात तय कर ली थी। पगलू टेंशन में था, कुछ सूझ नहीं रहा था कि कैसे होगा। उसने पड़ोसियों को इकट्ठा करके कहा-देखो अगर ऐश्वर्या की शादी धूमधाम से नहीं हुई तो सबकी बदनामी होगी। कुछ भी हो हमें रामचरन को पीछे छोड़ना है। सबकी इज्जत दांव पर है। पगलू के फुंकार पर सबने रुपए इकट्ठा करने पर हामी भर दी। इनके यहां शादी के लिए शुभ-अशुभ की तारीख नहीं देखते। 17 नवंबर शादी का डेट फिक्स। हमारे घर पर भी आकर पगलू कुछ पैसा ले गया।

गाड़ी के लिए पगलू ने चंदा इकट्ठा कर लिया, अब बारी खरीदने की थी। गाड़ी के लिए पगलू ने गांव के कुछ प्रतिष्ठित लोगों से हाथ-विनती जोड़ा। लोगों ने गाड़ी खरीदवा दी लेकिन यह क्या, भाई साब के लिए यह जैसे किसी यज्ञ के समान था। घर पर गाड़ी आते ही पड़ोसियों का मुंह मीठा होने लगा।

लगा जैसे इस गाड़ी पर वह खुद चढ़ने वाला हो। 17 नवंबर का दिन आ गया। घर को सजाने के लिए लाइट का इंतजाम, हलवाई, साउंड, सब अपनी जगह जमने लगे। खाने में इनके यहां सुअर का गोश्त खासकर बनता है। हलवाई को खास हिदायत दी गई इसको बनाने के लिए। पगलू के यहां मजमा लग गया। पूरे गांव को निमंत्रण मिला था, जिसके तहत सब पहुंचे और जथा-शक्ति, तथा भक्ति मदद भी की।

रात के 8 बज गए। बारात का कोई अता-पता नहीं। पूरा बनबासी खानदान टकटकी लगाए दूल्हे राजा का इंतजार कर रहा था। इसी बीच पगलू के साले साब रामखेलावन ने दो घूंट लगा लिया। इतना ही नहीं अपने जीजा जी को भी मदिरापान करा दिया। बस अब क्या था-जैसे-2 देर हो रही थी पगलू के मुंह से गालियों का दौर शुरु हो गया। आखिरकार लगभग 12 बजे बारात आ गई। आधे लोग तो सो गए थे, ऐश्वर्या की आंख पर भी पानी का छींटा मारकर जगाया गया।

सभी लोग आंख मीजते हुए उठे लेकिन यह क्या पगलू बौखला गया था। शादी नहीं होगी, बारात वापस ले जाओ, इन सालों ने किया हुआ वादा तोड़ दिया है, कोई कुछ भी कर ले अब दूसरी जगह ही शादी होगी। लोगों ने पूछना शुरु किया अरे हुआ क्या, जो इतना गरज रहे हो। बारात तो आ गई है, रोड लाइट भी है, बैंड बाजा भी ठीक-ठाक है, शादी में पांच ट्रेक्टर भी है। किसी ने कहा-अरे बारात देर से आई इसलिए पगलू भैया नाराज हो क्या। इतना कहना था कि पगलू जी का पासा सातवें आसमान पर पहुंच गया। अबे धत्...ये सब बात नहीं है।

शादी तय करते समय ही-यह सौदा हो गया था कि बारात लेकर आना लेकिन साथ में डीजे होना ही चाहिए। अब रामचरन के यहां डीजे आया था, मेरी इज्जत तो गई ना...। समाज में क्या मुंह दिखाऊंगा। पूरे गांव में हल्ला किया था बेटी की शादी में डीजे आएगा लेकिन अरमानों पर पानी फिर गया। अब कुछ नहीं हो सकता-बारात वापस ले जाओ। बिना डीजे शादी नहीं होगी। उधर ऐश्वर्या का रोना-धोना भी शुरु हो गया था। वो भी डीजे को लेकर दहाड़े मार रही थी। बाप-बेटी के हंगामे ने पूरे गांव को आधी नींद (गांव में 9 बजे तक सब सो जाते हैं) से जगा दिया, हो हल्ला को देख-सुन लोग बनबासी द्वार पहुंच गए।

मनाने का सिलसिला शुरु हो गया लेकिन पगलू ने तो दो घूंट चढ़ा ली थी इसलिए उस समय वही कंडीशन हो गई थी, जैसे-भैंस के आगे बीन बजाओ, भैंस खड़ी पगुराय। वह किसी की बात नहीं सुन रहा था, बस डीजे को लेकर खूंटा गाड़ दिया। बाराती पक्ष पगलू की हरकतों से तंग आकर प्रधानजी की शरण में जा पहुंचा। काफी मिन्नते करने के बाद प्रधान ने फोन करके डीजे का इंतजाम करवा दिया। इतना होना था कि पगलू उछलने लगा, वो रामचरन को बुलाने लगा। देखो मेरी बेटी की शादी में डीजे आ रहा है, किसी औकात है हमारे सामने। लगभग 2 बजे सुबह डीजे की धुन पर जमीन हिलने लगी। सबको साइड में करके पगलू खुद उछल-कूद करने लगा।



ये भाई साब शराब में एकदम मस्त हो गए थे। किसी कोने से दो लोग आए और हांथ पकड़कर घर ले गए। काफी हंगामे के बीच ऐश्वर्या शादी के बंधन में बंध गई लेकिन पूरे गांव के लिए सिरदर्द बन चुकी यह शादी आखिरकार हो ही गई, सबने सबने राहत की सांस ली।

सुबह पगलू का नशा उतर गया, उसने रोते-गाते ऐश्वर्या को विदा भी कर दिया। लेकिन इतना तामझाम करने के बाद अब वह पूरी तरह कर्जे में डूब चुका था। सबने समझाया था कि पगलू काहे के लिए इतना खर्चा कर रहे हो लेकिन उसे तो रामचरन को पीछे छोड़ने का भूत सवार था। अब कम से कम 15 साल दूसरों के यहां काम करने के बाद ही पगलू कर्ज के बोझ से निकल पाएगा। लेकिन जहन में एक ही सवाल है कि दहेज और शादी का तामझाम किस तरह समाज में पैर पसार रहा है।

Thursday, November 24, 2011

'स्पेशल' के नाम पर आपके साथ भी हो सकता है 'अजीब'

इस इस बार गांव की मेरी यात्रा काफी अजीबोगरीब और कई मायनों में दिलचस्प भी रही। तारीख 11 नवंबर-सुबह 8.30 बजे ट्रेन पकड़ने की जल्दबाजी में रातभर फटाफट काम निपटाया। सुबह जल्दी-जल्दी रूम पर पहुंच-नहाया और हबीबगंज स्टेशन जा धमका। सबसे पहले मैंने स्टेशन पर लगे स्टेटश बोर्ड पर ताका-झांकी की, यहां से ही मेरे साथ कुछ अजीब होने की शुरुआत हो चुकी थी। बोर्ड पर आंखे फेरने के बाद भी ट्रेन का कोई अता-पता नहीं दिखा। जबकि अन्य ट्रेनों का पूरा लेखा-जोखा बोर्ड पर आ रहा था।

दिमाग चकरा गया-दो-तीन बार टिकट देखा कि कहीं गलत डेट पर तो नहीं आ गया, लेकिन सब सही था। दिल की धकड़कन तेज हो गई थी, पता नहीं ट्रेन को क्या हो गया, कहीं यह फर्जी टिकट तो नहीं ले लिया, या यह ट्रेन रद्द तो नहीं हो गई। तमात तरह की बाते मन में उफान मार रही थी लेकिन तब तक दिमाग में आ गया कि इंक्वायरी खिड़की तो अभी बाकी ही है।

यहीं से नैया पार लगने की आस लिए, धक्का-मुक्की कर खिड़की पर हाथ रख ही दिया। अंदर साब बड़ी तल्लीनता के साथ लोगों की परेशानियां दूर कर रहे थे, मैंने भी अपना दुख-दर्द बयां कर दिया। लेकिन एलटीटी स्पेशल ट्रेन की दशा और दिशा पूछा ही था कि सामने से गरम हवा आने लगी, साब तो आंखे तरेर रहे थे, जैसे मैंने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो।

बड़े साब कुछ देर तक तो मुझे ऊपर से नीचे तक आंखे फाड़कर देखते रहे। मुझे लगा शायद कुछ ऊंटपटांग बक दिया, साथ में खड़े दोस्त से कंफर्म किया लेकिन मैं सही निकला। ऐसा लगा जैसे साबजी इस ट्रेन का नाम पहली बार सुन रहे थे। मुंह मटकाना...कंप्यूटर में तांक झांक करना..मुझसे टिकट मांगना...बार-बार फोन घुमाकर किसी से घचर-पचर करना...सबकुछ अजीब था। खुद तो पसीने से भींग रहे थे, ठंड़ी में मुझे भी कुछ इसी तरह का एहसास दिलवा रहे थे।

सरजी बैठे तो थे इंक्वायरी कांउटर पर लेकिन वे सप्ताह में एक दिन चलने वाली इस स्पेशल ट्रेन से बिल्कुल अज्ञान थे। तभी तो बेचारे इतना पानी-पानी हो रहे थे। लेकिन आधे घंटे की उठा-पटक के बाद इनकी मेहनत ने अपना रंग दिखा दिया, और उन्हें ट्रेन के बारे में सारी जानकारी मिल गई। फिर क्या था बड़ी उत्सुकता के उन्होंने मेरे मुंह पर मेरा टिकट दे मारा और पूरी ट्रेन की यथास्थिति बयां कर दी। ट्रेन पूरे डेढ़ घंटे लेट थी। लेकिन इंतजार की अवधि बढ़ती ही गई...लगभग तीन घंटे का इंतजार। रातभर जगने से लग रही झपकी को खत्म करने के लिए कॉफी और चाय की चुस्की लेता रहा।

एस-2 में सीट नंबर 51। किसी ने बताया एकदम आगे की तरफ यह डिब्बा लगता है। सामान लेकर अड्डे पर जम, टकटकी लगा दी। और कुछ ही पल में वह दिख गई..दिख गई..अरे आ गई...आ गई...मोगैंबो खुश हो गया। लेकिन यह क्या, यहां भी अजीब। ट्रेन प्लेटफॉर्म पर गतिमान ही थी कि बड़ा झटका लग गया, पूरी बोगी ही उल्टी लग गई थी, आगे का पीछे और पीछे का आगे। अब तो बोल्ट की तरह दौड़ लगानी पड़ गई...हांफते-हांफते हालत खराब..इतना तेज कभी नहीं दौड़ा था। लेकिन समय रहते मंजिल मिल गई। ऊपर की सीट थी, सामान रखा और बिना कुछ सोचे-समझे चैन की नींद लेने के लिए पैर फैला दिया।

कुंभकर्णी नींद ऐसी लगी कि पता ही नहीं चला शाम के 6 कब बज गए। आंख मींजते हुए उठा, अगल-बगल वालों से गाड़ी की स्थिति के बारे में पूछा तो वो भी घूरने लगे। लेकिन थोड़ा रुकने के बाद गुर्राकर नीचे बैठे एक जनाब ने दयादृष्टि दिखाई और कहा-जनाब यह स्पेशल ट्रेन पूरे पांच घंटे लेट चल रही है। यहां भी अजीब तब लगा जब लोग बताने लगे कि हर मालगाड़ी के क्रॉस होने के बाद ही हमारी गाड़ी को हरी झंड़ी मिल रही है। सभी गाली दे रहे थे, साला नाम है स्पेशल लेकिन है पैसेंजर से भी बदतर। पैदल चल दूंगा लेकिन अब कभी स्पेशल के चक्कर में नहीं पड़ूंगा।

मैं भी थोड़ा परेशान हुआ लेकिन फिर यह सोचा कि रात में पहुंचकर वैसे भी क्या करूंगा। यात्रा का मजा लो। लेकिन मेरे मजे का आइडिया अब डर में बदल रहा था। कानपुर के पहले एक स्टेशन पड़ता है उरई। यहां पर मटकी में रसगुल्ला बड़ा फेमस है। पांच रुपया पर पीस। भूख लगी थी, पूरा मटका ही खरीद लिया। इसमें 15 पीस थे। सबके सब चट कर गया। हालांकि एक साथ यह नहीं खाया लेकिन धीरे-धीरे करके सब निपटा दिया, क्योंकि भूख का भंवर काफी गहरा हो गया था।

6.30 बजे गाड़ी उरई में खड़ी थी, वहां से कानपुर पहुंचने में लगभग 3 घंटे लगने वाला था, जैसा कि बताया जा रहा था। लेकिन जब एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन के बीच कोई गाड़ी दस बार स्टे करेगी तो खाक समय से कोई पहुंचेगा। लगभग 12 बजे गाड़ी कानपुर पहुंची। यहां पहुंचते ही मेरी तो सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। क्योंकि यहां भी कुछ अजीब हो गया। पूरी बोगी ही खाली हो गई। सन्नाटा छा गया, बचे सिर्फ 5 लोग। गुदगुदाती ठंड़ में नींद भी आ रही थी, डर भी लग रहा था कि पता नहीं, कब क्या होगा।

भोपाल से चलते टाइम किसी ने यह भी बता दिया था कि कानपुर से इलाहाबाद के बीच थोड़ा सतर्क रहना। लेकिन यह बात यूं ही में टाल दी थी कि कोई बात नहीं 10 बजे तक तो घर पहुंच जाऊंगा। डर वाली कोई बात नहीं लेकिन यह क्या सब उल्टा हो गया। पांच लोग वो भी अनजान, उनके पास जाने की भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। पहले नीचे की सीट पर बैठा था लेकिन मौके की नजाकत को देख ऊपर की सीट पर जा बैठा। सामान ऊपर की सीट से नीचे रख लिया था लेकिन फिर से शिफ्टिंग कर ली।

गेट के साथ अगल-बगल की खिड़कियों को भी बंद कर दिया था। कानपुर से थोड़ी दूर जाने पर भी अजीब दास्तां गुजरी। यहां गाड़ी रुकी, दूसरे गेट से दो साधु महाराज अंदर पधारे। लेकिन इनके पहनावे ने हालत फिर से खस्ता कर दी। रात के एक बजे...जबरदस्त ठंड़ लेकिन इनका बदन पूरी तरह से खाली।

हाथ में बड़ा सा त्रिशूल, दूसरी हाथ में एक सामान से भरी बोरी। लंबे बाल और दाढ़ी। चेहरा एकदम खूंखार। अब क्या करूं। देखते ही चेहरे पर चद्दर डाल ली और चद्दर का एक कोना उठाकर धीरे-2 उनकी गतिविधियों पर नजर डालता रहा। कुछ देर बाद ये लोग भी सो गए। थोड़ी राहत मिली।

सुबह के 3.30 बजे ट्रेन जैसे-तैसे इलाहाबाद पहुंची तो जाकर जान में जान आई। लेकिन अब भी जहन में एक सवाल कौंध रहा था कि स्पेशल के नाम पर लोगों के साथ यह कैसा मजाक किया जा रहा है। जिस ट्रेन को रात 9.30 बजे पहुंचनी थी, वह सुबह 3.30 बजे पहुंच रही है। जितने लोग ट्रेन में थे सब कहीं न कहीं से परेशान दिख रहे थे, तौबा कर रहे थे। जो लोग स्टेशन पर अपने सगे-संबंधियों को लेने आये तो उनपर भी डांट पड़ रही थी। अरे टिकट बुक कराने को लेकर।

साथ में लोग अपने बच्चों, एजेंटो को कोस रहे थे कि पता नहीं क्या देखकर इस ट्रेन में टिकट करवा दिया। लेकिन मैं किसी को नहीं कोस सकता था क्योंकि इस ट्रेन में मैंने खुद ही टिकट करवाया था। फिर भी तकलीफ हुई कि क्या यही है हमारी इंडियन ट्रेन। ऐसे ही हम पड़ोसियों से आगे निकलेंगे। हालांकि मैंने भी कान पकड़ लिया था कि अब कभी भी इस तरह का स्पेशल नहीं बनूंगा।